@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर 

महिला आरक्षण?? कब तक इस देश का नपुंसक समाज, सड़ांध मारता राजनैतिक सिस्टम और पाशविक पुरुषत्व, लड़कियों और महिलाओं के जज्बातों, भावनाओं और खुशहाल भविष्य को अपना गुलाम बनाए रखेगा??

महिला सशक्तिकरण का रास्ता संसद से नहीं, बल्कि पुरुष वर्चस्व और आर्थिक निर्भरता की बेड़ियाँ तोड़ने से शुरू होता है।देश की महिलाओं और लड़कियों इसे ब्रह्म वाक्य बनाओ।

क्या भारतीय पुरुषों और देश के विभिन्न समाज में इतनी ‘मर्दानगी’ है कि वे महिलाओं के ‘स्वतंत्र अस्तित्व’ को स्वीकार कर सकें?

सवाल केवल राजनीतिक आरक्षण का नहीं, बल्कि उस पुरुषवादी मानसिकता का है जो हर स्तर पर महिला के वजूद को नकारती है। क्या हमारा समाज महिलाओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार है? जब बात प्रेम, विवाह, शिकायत करियर और व्यक्तिगत निर्णयों , सहमति और असहमति की आती है, तो पुरुष प्रधान व्यवस्था का पुरुषत्व खतरे में पड़ जाता हैं!! असली चुनौती समाज कि उस संकीर्ण और नपुंसक सोच को बदलने की है जो महिला को बराबरी का हक देने से डरती है।”

राजनीति में आरक्षण की मांग तो बाद की बात है, पहले महिलाओं को उस पुरुषवादी मानसिकता और उसके सामाजिक-आर्थिक ढांचे की बेड़ियों को तोड़ना होगा जिसने स्त्री को सदियों से गुलाम बना रखा है। असली आजादी मानसिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता से शुरू होती है।”

सिर्फ संसद, विधानसभाओं नगर निगमो और पंचायतों की कुर्सियों पर बैठने से बदलाव नहीं आएगा। जब तक महिलाएं समाज में पुरुष प्रधान सोच, उनके वर्चस्व और आर्थिक निर्भरता के चक्रव्यूह में फंसी है, तब तक उनका हर अधिकार अधूरा है। राजनीतिक आरक्षण से पहले, सामाजिक और मानसिक दासता से मुक्ति अनिवार्य है।

राजनीति में जगह तो मिल जाएगी, लेकिन पहले उस सोच और सिस्टम से लड़ना जरूरी है जो महिलाओं को पुरुषों और उनकी व्यवस्थाओं के अधीन रखता है। जब महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र होंगी तभी राजनीतिक आरक्षण का सही लाभ उठा पाएंगी।”

समाज में पुरुषों, पुरुष मानसिकता, पुरुषों के वर्चस्व, पुरुषों की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गुलामी से तो पहले मुक्त हो जाओ!! फिर राजनीति में आरक्षण की बात करना?

क्या देश में घर से लेकर राजनैतिक पार्टीयों तक में महिलाओं का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार्य होता है? क्या इस देश का पुरुष समाज महिलाओं का समाज में “स्वतंत्र अस्तित्व” को मानने का पुरुषत्व रखता हैं? प्रेम, विवाह, शिक्षा, रोजगार, से लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार की स्वतंत्रता देने का जिगरा सीने में और मूंछों के ताव में रखता हैं??

@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर

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