@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
इंदौर रियल एस्टेट: प्रॉपटेक कंपनियों का ‘कॉर्पोरेट खेल’ या अवैध डायरी जैसा बड़ा जोखिम?

कुछ सालों में रियल एस्टेट क्षेत्र में आयी प्रॉपटेक कंपनियों का मॉडल पारंपरिक बिल्डरों जैसा नहीं है जो बैंक लोन या खुद की पूंजी से जमीन खरीदते हैं। ये प्रॉपटेक कंपनियां तरह क्राउडफंडिंग (Crowdfunding) पर चलती हैं। हाल ही में इंदौर की ही एक प्रॉपटेक कंपनी जिसकी पेड अप कैपिटल मात्र 1 लाख रुपए है और लाखों रुपए के घाटे में चल रही हैं उसके द्वारा ₹90 करोड़ की फंडिंग जुटाने की खबर सामने आई है।
‘ग्लोबल आईटी हब’ और ‘इंदौर का नया भविष्य’ जैसे भारी-भरकम मार्केटिंग विज्ञापनों के पीछे छिपा कानूनी चक्रव्यूह!! न रजिस्ट्री, न रेरा (RERA) की सुरक्षा, न सेबी (SEBI) में रजिस्ट्रेशन!!
आखिर किसका डूबेगा पैसा?
इंदौर का रियल एस्टेट बाजार इस समय एक अभूतपूर्व बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां पारंपरिक रूप से जमीनों के सौदे ‘डायरी’ और पर्चियों पर होते आए हैं (जिन्हें पूरी तरह अवैध माना जाता है), वहीं दूसरी तरफ कॉर्पोरेट इंफ्रास्ट्रक्चर, चकाचौंध भरी ब्रांडिंग और भ्रामक डिजिटल मार्केटिंग के सहारे एक नया ‘प्रॉपटेक’ (Property Technology) निवेश मॉडल पैर पसार रहा है।
ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर के आस पास, सुपर कॉरिडोरऔर बायपास जैसी प्राइम लोकेशंस को “इंदौर का नया भविष्य” और “ग्लोबल आईटी हब” दिखाकर निवेशकों से करोड़ों रुपये जुटाए जा रहे हैं।
लेकिन इस कॉर्पोरेट चमक-दमक के पीछे एक ऐसा कानूनी और वित्तीय रिस्क छिपा है, जो आने वाले समय में छोटे निवेशकों के लिए एक बड़ा वित्तीय हादसा साबित हो सकता है। जमीनी हकीकत यह है कि यह पूरा रिस्क चालाकी से आम निवेशक के सिर पर ट्रांसफर करने का खेल है।
क्या है प्रॉपटेक का मायाजाल? आप ‘ग्राहक’ नहीं, ‘बिजनेस पार्टनर’ हैं!
यह “हाई-रिस्क और भ्रामक मार्केटिंग” का सटीक उदाहरण है। आम आदमी जब ऐसी छोटी प्रॉपटेक कंपनियों में पैसा लगाता है, तो उसे लगता है कि वह जमीन या दुकान खरीद रहा है, उसमें निवेश कर रहा है, प्रॉफिट में बराबर का हिस्सेदार होगा। लेकिन असलियत बेहद चौंकाने वाली है!!
जब आप किसी पारंपरिक बिल्डर से प्लॉट या फ्लैट खरीदते हैं, तो आप कानून की नजर में “Allottee” (खरीदार) होते हैं। प्रोजेक्ट लेट होने या धोखा होने पर रेरा (RERA) आपको तगड़ा संरक्षण देता है। लेकिन प्रॉपटेक कंपनियां आपको जमीन की रजिस्ट्री नहीं देतीं।
आपका पैसा एक LLP (Limited Liability Partnership) या SPV (Special Purpose Vehicle) में जाता है। कानूनी रूप से आप उस प्रोजेक्ट के सह-मालिक (Co-owner) या बिजनेस पार्टनर बन जाते हैं। कल को अगर प्रोजेक्ट डूबता है या कंस्ट्रक्शन रुकता है, तो आप कोर्ट में ‘ठगी’ का केस नहीं कर सकते, क्योंकि कानून कहेगा—आप तो खुद उस बिजनेस के नफा-नुकसान के पार्टनर थे?
‘लिमिटेड लायबिलिटी’ कंपनियों की आड़ में खेला जा रहा है खेल:
हर नए प्रोजेक्ट के लिए एक नई LLP कंपनी बनाई जाती है। यदि वह प्रोजेक्ट फेल होता है, या रुक जाता है, मंदी की वजह से नहीं बिक पाता है तो आपका पैसा लंबे समय के लिए अटक सकता है, फंस सकता है, यहाँ तक कि वह पर्टिकुलर LLP, फर्म खुद को दिवालिया (Bankrupt) घोषित कर सकती हैं!
लेकिन आप मुख्य प्रॉपटेक कंपनी या उसके प्रमोटर्स की व्यक्तिगत संपत्ति पर कोई दावा नहीं ठोक सकते।
न सेबी (SEBI) का डर, न तुरंत लिक्विडिटी की गारंटी
भारत में फ्रैक्शनल रियल एस्टेट (एक ही प्रॉपर्टी में कई लोगों की छोटी हिस्सेदारी) के लिए सेबी (SEBI) के नियम बेहद कड़े हैं। इस कड़े नियंत्रण से बचने के लिए कई प्रॉपटेक कंपनियां सेबी से मान्यता लेने के बजाय मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (MCA) के तहत सिर्फ LLP बनाकर काम कर रही हैं। इसके चलते निवेशकों के पास कोई मजबूत संस्थागत शिकायत निवारण मंच (Grievance Redressal Forum) नहीं बचता।
इमरजेंसी में फंसेगा पैसा: नो एग्जिट ऑप्शन
प्रॉपटेक कंपनियां अपने ऐप पर दावा करती हैं कि आप शेयर मार्केट की तरह एक क्लिक में अपनी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकल सकते हैं। लेकिन यह पूरी तरह भ्रामक है। यह कोई ओपन स्टॉक एक्सचेंज नहीं है, बल्कि कंपनी का “प्राइवेट मार्केटप्लेस” है। जब तक ऐप के अंदर ही कोई दूसरा खरीदार आपकी हिस्सेदारी लेने को तैयार नहीं होता, आपका पैसा पूरी तरह ब्लॉक रहेगा। किसी मेडिकल या बिजनेस इमरजेंसी में आप इस प्रॉपर्टी से तुरंत कैश नहीं निकाल सकते।
रिटेल निवेशको, आईटी प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स और प्रवासी भारतीय (NRIs)। इन लोगों से मोबाइल ऐप के जरिए ₹5 लाख, ₹10 लाख या ₹25 लाख के छोटे टिकट साइज में अलग-अलग प्रोजेक्ट्स की LLPs या पार्टनरशिप फर्म को दिखाकर पैसा निवेश करवाया जा रहा हैं।
कई टाउनशिप और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के पूर्ण होने की RERA टाइमलाइन 2029 या उसके बाद की है। यानी अगले कई सालों तक निवेशकों का पैसा केवल कंस्ट्रक्शन के रिस्क पर लगा रहेगा।
जिस दिन कंस्ट्रक्शन कॉस्ट लिमिट से बाहर हुई या बाजार में मंदी आई, या प्रोजेक्ट नहीं बिकता है, उस दिन छोटे व मध्यम वर्गीय निवेशकों के लिए एक बहुत बड़ी वित्तीय त्रासदी में बदल सकता है।
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
