@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
कब तक पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के संगठन किसी सोसाइटी या सोशल क्लबों की तरह काम करते रहेंगे?

अब समय आ गया है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ “मीडिया” को वैधानिक रूप से सुरक्षित, प्रभावशाली और गौरवान्वित रखने के लिए वकीलों जैसी संगठित एकजुटता की आज सख्त जरूरत है। और यह तभी हो सकता हैं जब बार काउंसिल और जिला बार एसोसिएशन की तरह प्रत्येक पत्रकार और मीडिया कर्मी को जिला प्रेस क्लब (वो प्रेस क्लब जिन्हें प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो और मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग से मान्यता प्राप्त हो) का सदस्य बनना अनिवार्य होगा।
लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण स्तंभ—न्यायपालिका में वकील और मीडिया में पत्रकार और मीडियाकर्मी— अक्सर सत्ता और सिस्टम के निशाने पर रहते हैं। लेकिन जब बात अपने अधिकारों की रक्षा, सुरक्षा और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने की आती है, तो वकीलों और पत्रकारों के संगठनों की कार्यशैली में एक जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है।
पूरे देश में जिला और तहसील स्तर पर वकीलों के बार एसोसिएशन इतने संगठित और शक्तिशाली हैं कि किसी भी साथी वकील पर होने वाली गैर-कानूनी पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ वे सड़कों पर उतर आते हैं। ‘एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट’ लागू करवाने के लिए उनकी सामूहिक हुंकार सरकार तक को हिलाने और झुकाने का माद्दा रखती है।
इसके विपरीत, पत्रकारों के संगठन और प्रेस क्लब अपने साथियों की सुरक्षा, फर्जी मुकदमों और ‘पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट’ जैसी बुनियादी मांगों को लेकर उस स्तर का प्रभावशाली और एकजुट विरोध नहीं दिखा पाते।
आखिर इस विडंबना के पीछे क्या कारण हैं? आइए इसे कुछ मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझते हैं।
बार काउंसिल और बार एसोसिएशन कानूनन (Statutory Body) बेहद मजबूत और संस्थागत रूप से संगठित होते हैं। हर वकील के लिए इसका सदस्य होना और इसके नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है।
इसके विपरीत, प्रेस क्लब और पत्रकारों के संगठन ज्यादातर केवल ‘पंजीकृत सोसायटियों’ या क्लबों की तरह काम करते हैं। इनमें वकीलों जैसी कोई कानूनी या वैधानिक बाध्यता नहीं होती, जिससे इनकी सामूहिक शक्ति कमजोर हो जाती है।
वैचारिक मतभेद होने के बावजूद, जब बात किसी वकील की सुरक्षा या सम्मान की आती है, तो सभी वकील अपनी राजनीतिक विचारधारा को भूलकर एक झंडे के नीचे आ जाते हैं।
पत्रकारिता आज अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं, मीडिया घरानों की नीतियों और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में बुरी तरह बंटी हुई है। जब किसी एक पत्रकार पर गाज गिरती है, तो दूसरे संगठन या धड़े अक्सर मूकदर्शक बने रहते हैं ?
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के इस दौर में ‘पत्रकार’ कौन है, इसकी कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा या कड़ा नियम नहीं है। इस वजह से कई बार संगठन असली पत्रकारों के उत्पीड़न और निजी स्वार्थ के लिए पत्रकारिता का चोला ओढ़े लोगों के बीच फर्क नहीं कर पाते, जिससे पत्रकारिता की साख कमजोर होती है। डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया खासकर यू ट्यूबर पत्रकारों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान होना अति आवश्यक है।
पत्रकारों को यदि अपनी सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करनी है, तो उन्हें वकीलों की तरह ‘एक के लिए सब और सब के लिए एक’ के सिद्धांत को अपनाना होगा। और पत्रकारों के संगठनों को कानूनी संस्थाओं की तरह मान्यता प्राप्त होना होगा।
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
