@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर

असली सरकार जिला मुख्यालयों में बैठती हैं न कि राज्यों और देश की राजधानी में। मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से आज तक 140 करोड़ देशवासियों को सीधे कोई काम नहीं पड़ा है।

क्या कॉकरोच, कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेता लोकतंत्र में “सरकार” का क्या मतलब होता हैं इतना भी नहीं जानते है? या जनता को बताना नहीं चाहते है? 

कॉकरोच जनता पार्टी का संस्थापक अभिषेक दीपके, प्रवक्ता सौरभ दास और यू ट्यूबर ध्रुव राठी ये सब पोलिटिकल टूल किट हैं कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के? 

लोकतन्त्र में जनता का सबसे बड़ा और पहला गद्दार, धोखेबाज़ और चालबाज़ क्षेत्र का सरपंच, पार्षद, विधायक और सांसद होता हैं, क्योंकि जनता ने इन्हें विश्वास के साथ चुना है। दूसरा नंबर आता है क्षेत्र के विपक्षी दलों के नेताओं का। तीसरा नंबर आता है विभाग के मंत्री का। चौथे नंबर आता है मुख्यमंत्री का। और सबसे आखिरी में पार्टी आलाकमान और प्रधानमंत्री का जिनकी जिम्मेवारी है इस पूरे सिस्टम की जनता के प्रति जवाबदेही की।

यदि आप और हम यह समझते हैं कि चीफ सेक्रेटरी, कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस के आला अधिकारी और इनके मातहत सरकारी महकमा जनता के लिए काम करते हैं? तो हम न सिर्फ गलतफहमी में जी रहे वरन् पीढ़ियों से मूर्ख हैं। ये नौकरशाह और इनके अधीनस्थ आप और हमारे द्वारा चुने गए विधायकों, पार्टी द्वारा बनाए गए मंत्रियों, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के लिए काम करते हैं। 

और इसी भ्रष्ट, दुष्ट, और धृष्ट सरकारी सिस्टम को अपनी उंगली और पांवों तले रखने के लिए लोकतंत्र में चुनाव की परंपरा है। जिस पार्टी को बहुमत है उस पार्टी की सरकार है। और उसका मुखिया इस सरकारी सिस्टम का शहंशाह है। और शहंशाह के नौकरो को नौकरशाह कहा जाता हैं।

क्या आज तक इस देश के किसी नेता, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री ने कभी उन “सरकारी दफ्तरों” के भीतर झांककर देखा है, जहाँ जनता की पीढ़ियां अपने हक, अधिकार और इंसाफ पाने के लिए सदियों से दम तोड़ती आ रही हैं?

क्या देश के किसी भी विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री में आज यह नैतिक साहस और हिम्मत बची है कि वे सार्वजनिक मंच से किसी अदना कर्मचारी से लेकर आला अधिकारी तक को खुलेआम यह चेतावनी दे सकें कि वे जनता के सेवक हैं, शासक नहीं? 

सरकारों के चीफ सेक्रेटरी, कमिश्नर, कलेक्टर से लेकर एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी तक… और थानों के टी आई, पुलिस कप्तान, आईजी, डीजीपी से लेकर आरटीओ, आबकारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पीडब्ल्यूडी और नगर निगम के इन आला अफसरों के एयर कंडीशन ऑफिस के दरवाजों पर इस देश का आम नागरिक आज भी न्याय की भीख मांग रहा है। लेकिन इन सरकारी दफ्तरों में इंसाफ की देवी को वैश्या बनाकर उसकी नीलामी की बोलिया लगाई जा रही हैं।

ये कोई सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि वह यातना गृह हैं जहाँ लोग अपने हक और अधिकारों के लिए पीढ़ियों से चप्पलें घिस रहे हैं, नाक रगड़ रहे हैं और हाथ जोड़कर पैरों में गिर रहे हैं। हद तो यह है कि अपनी खून-पसीने की कमाई लुटाने के बाद भी जब इन अफसरों की अवैध मांगें और रिश्वत की भूख शांत नहीं होती, तो इस देश की बेबस परिवारों, माताओं-बहनों को अपने मंगलसूत्र, गहने और पुश्तैनी जमीन तक सूदखोरों के पास गिरवी रखनी पड़ती है। 

@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर

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