@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
270 साल बाद क्या आज भी देश की जनता तमाशबीन से ज्यादा कुछ नहीं है?

विधायिका, प्रशासनिक सिस्टम, न्यायिक सिस्टम और मीडिया ही जब देश को बर्बाद करने पर उतारू हो तो जनता का क्या कर्तव्य बनता हैं अपने देश के लिए?
विकास और शक्तिशाली साम्राज्य की बात करे तो सोने की लंका भी विकास और शक्तिशाली होने का अनुपम उदाहरण है?
सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने ब्रिटिश संसद में भारत की तत्कालीन स्थिति पर टिप्पणी करते हुए इस बात का जिक्र किया था कि जब अंग्रेज सेना विजयी होकर नवाब की राजधानी मुर्शिदाबाद में दाखिल हुई तो उसने देखा लाखों लोग सड़क के दोनों तरफ खड़े होकर तमाशा देख रहे थे!!
यदि उन सभी तमाशा देखने वाले भारतीयों ने केवल एक-एक पत्थर भी उठाकर हमारे ऊपर फेंक दिया होता, तो हम मुट्ठी भर अंग्रेज वहीं खत्म हो जाते और भारत का इतिहास कुछ और होता।
उस समय मुर्शिदाबाद की आबादी लंदन जितनी ही समृद्ध और बड़ी थी।
मूकदर्शक (तमाशाबीन) बने रहने की आदत देश को गुलाम बना देती है।
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
