@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर

सरकारी संसाधन और सुविधाएं, मंत्रियों का समय और जनता के टैक्स का पैसा, क्या धार्मिक उत्सवों पर खर्च करना जायज है?

संवैधानिक पदों पर बैठे मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक की बढ़ती धार्मिक सक्रियता में कितना समय, सरकारी पैसा और सुविधाएं धार्मिक आयोजनों में किस संवैधानिक अधिकार से इस्तेमाल किया जा रहा हैं?? क्या देश का संविधान इसकी इजाजत देता है?

सवाल यह है कि सरकारी वेतन और सरकारी पैसों से मिलने वाली सुविधाओं पर पलने वाले मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक अपने कार्य समय (Working Hours) और खर्च का हिसाब जनता को देना जरूरी क्यों नहीं है?

कई मंत्रियों के समय का बड़ा हिस्सा अब विकास कार्यों के बजाय मंदिरों, महंतों और कथावाचकों के बीच बीत रहा है?

मंत्रियों का समय जनसमस्याओं के समाधान के लिए होता है, लेकिन कई मंत्री यहां तक कि मुख्यमंत्री घंटों से लेकर पूरा पूरा दिन धार्मिक अनुष्ठानों, सभाओं और उत्सवों में बिताते हैं।

सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं। सरकारी हेलीकॉप्टर, गाड़ियाँ और सुरक्षा तंत्र, जो लोकहित के लिए हैं, उनका उपयोग धार्मिक आयजनो के लिए हो रहा है??

एक मंत्री की धार्मिक यात्रा के लिए पूरा जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र अपनी नियमित ड्यूटी छोड़कर वीआईपी सेवा में लग जाता है?

अब समय आ गया है कि देश की जनता को उन मुख्यमंत्रीयो, मंत्रियों और विधायकों का ‘बायकॉट’ या कड़ा विरोध करे जो सरकारी तंत्र का दुरुपयोग धार्मिक अनुष्ठानों के लिए करते हैं?

जनता को यह पूछने का अधिकार हैं कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बजट के सरकारी पैसों का धार्मिक आयोजनों पर होने वाला यह ‘अघोषित खर्च’ किस वैधानिक आधार पर किया जा रहा है?

सरकारी खजाना, मंत्रियों का समय और संसाधन जनता की अमानत है। किसी मुख्यमंत्री और सरकार के मंत्री की जागीर नहीं।

@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर

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