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झूठे विज्ञापनों को आधार बनाकर गारंटी दी जाती है, जो पूरी नहीं हो पाती
नई दिल्ली। आज ग्राहक जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, बिना मानक की वस्तुओं की बिक्री, अधिक दाम, गारंटी के बाद सर्विस नहीं देना, हर जगह ठगी, कम नाप-तौल इत्यादि संकटों से घिरा है। ग्राहक संरक्षण के लिए विभिन्न कानून बने हैं। इसके फलस्वरूप ग्राहक सरकार पर निर्भर हो गया है। जो लोग गैर कानूनी काम करते हैं, जैसे- जमाखोरी, कालाबाजारी करने वाले, मिलावटखोर इत्यादि को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। ग्राहक चूंकि संगठित नहीं है, इसलिए हर जगह ठगा जाता है। ग्राहक आंदोलन की शुरुआत यहीं से होती है। ग्राहक को जागना होगा व स्वयं का संरक्षण करना होगा। उपभोक्ता आंदोलन का प्रारंभ अमेरिका में रल्प नाडेर द्वारा किया गया था। आजकल भ्रमित करने वाले झूठे विज्ञापनों को आधार बनाकर उपभोक्ता का शोषण करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कभी-कभी तो असंभव बातों की गारंटी दी जाती है, जो पूरी नहीं हो पाती है। ऐसे शोषण से उपभोक्ता को बचाने के लिए केंद्र द्वारा बनाया गया मोनोपोलिस एंड रेस्ट्रिक्टिव ट्रेड प्रेक्टिसेस एक्ट प्रभावशील है, जिसे संक्षेप में एमआरटीपी एक्ट कहा जाता है। ऐसी शिकायत होने पर उपभोक्ता को इसकी सूचना एमआरटीपी कमीशन को देनी चाहिए।
शिकायतें क्या-क्या हों?

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व्यापारी द्वारा अनुचित/प्रतिबंधात्मक पद्धति का प्रयोग करने से यदि आपको हानि हुई है अथवा खरीदे सामान में खराबी है या फिर किराए पर ली गई, उपभोग की गई सेवाओं में कमी है या विक्रेता ने प्रदर्शित मूल्य, लागू कानून द्वारा या मूल्य से अधिक लिया गया है या कानून का उल्लंघन करते हुए जीवन तथा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करने वाला सामान जनता को बेचा जा रहा है, तो आप शिकायत कर सकते हैं।
शिकायत कैसे करें
शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत सादे कागज पर की जा सकती है। शिकायत में शुद का तथा विपरीत पार्टी का नाम, विवरण, पता, शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह कब, कहां हुआ आदि का विवरण, उल्लिखित आरोपों के समर्थन में दस्तावेज साथ ही प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए। इस प्रकार की शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी वकील की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही इस कार्य पर नाममात्र न्यायालय शुल्क लिया जाता है।
शिकायत कहां की जाए
शिकायत कहां करें, यह बात सामान सेवाओं की लागत अथवा मांगी गई क्षतिपूर्ति पर निर्भर करती है। अगर यह राशि 2० लाख रुपए से कम है, तो जिला फोरम में शिकायत करें। यदि यह राशि 2० लाख रुपए से अधिक, लेकिन एक करोड़ रुपए से कम है, तो राज्य आयोग के समक्ष और यदि एक करोड़ रुपए से अधिक है, तो राष्ट्रीय आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
देश में उपभोक्ता संरक्षण
जहां तक भारत का प्रश्न है, उपभोक्ता आंदोलन की दिशा 1966 में जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कुछ उद्योगपतियों द्वारा तय की गई। उपभोक्ता संरक्षण के तहत फेयर प्रैक्टिस एसोसिएशन की मुंबई में स्थापना की गई और इसकी शाखाएं कुछ प्रमुख शहरों में स्थापित की गईं। स्वयंसेवी संगठन के रूप में ग्राहक पंचायत की स्थापना बीएम जोशी द्वारा 1974 में पुणे में की गई। अनेक राज्यों में उपभोक्ता कल्याण हेतु संस्थाओं का गठन हुआ। इस प्रकार उपभोक्ता आंदोलन आगे बढ़ता रहा। 9 दिसम्बर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक संसद ने पारित किया और राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होने के बाद देशभर में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। इस अधिनियम में बाद में 1993 व 2002 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन व्यापक संशोधनों के बाद यह एक सरल व सुगम अधिनियम हो गया है। इस अधिनियम के अधीन पारित आदेशों का पालन न किए जाने पर धारा 27 के अधीन कारावास व दंड तथा धारा 25 के अधीन कुर्की का प्रावधान किया गया है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार कोई व्यक्ति जो अपने उपयोग के लिए सामान अथवा सेवाएं खरीदता है, वह उपभोक्ता है। क्रेता की अनुमति से ऐसे सामान, सेवाओं का प्रयोग करने वाला व्यक्ति भी उपभोक्ता है। अत: हममें से प्रत्येक किसी न किसी रूप में उपभोक्ता ही है।

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