फिजिशियन एवं कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप मेहता ने हीमोग्लोबिन के संदर्भ में चर्चा करने पर बताया कि आयरन और प्रोटीन ही ग्लोबिन टॉनिक के बेहतर विकल्प हैं। धंधे का खून यह मसला भी इससे ही स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे टॉनिक बनाने वाले कई छोटी कंपनियां, जो रिसर्च अनुसंधान पर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने से बचते हुए प्रोटीन एवं आयरन की प्रचुरता वाली वस्तुओं के धंधे का भी खून करने में लगी हैं।

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इंदौर। पशुओं के खून का धंधा कई कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। खून की व्यापक पैमाने पर खरीदी करते हुए ये कंपनियां उसमें से हीमोग्लोबिन निकालकर विभिन्न ब्रांड नाम से ग्लोबिन टॉनिक के रूप में बेच रही हैं और अल्प लागत से बने इन टॉनिकों की बिक्री से भारी मुनाफा अर्जित किया जा रहा है, जबकि काफी सस्ते दामों पर खरीदे गए जानवरों के खून में ब्लड कैंसर अथवा अन्य घातक बीमारियां फैलाने वाले बैक्टीरिया आदि को दूर करने हेतु कई कंपनियां कोई खर्च नहीं करना चाहतीं। मानव स्वास्थ्य के लिए ऐसे टॉनिक खतरनाक भी हो सकते हैं। फिजिशियन एवं कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप मेहता ने हीमोग्लोबिन के संदर्भ में चर्चा करने पर बताया कि इसकी कमी से मनुष्य एनीमिया का शिकार हो जाता है। वैसे इस कमी को दूर करने के लिए आयरन व प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराना काफी है। आयरन और प्रोटीन ही ग्लोबिन टॉनिक के बेहतर विकल्प हैं। धंधे का खून यह मसला भी इससे ही स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे टॉनिक बनाने वाली कई छोटी कंपनियां, जो रिसर्च अनुसंधान पर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने से बचते हुए प्रोटीन एवं आयरन की प्रचुरता वाली वस्तुओं के धंधे का भी खून करने में लगी हैं। गौरतलब है कि प्रोटीन एवं आयरन अनाज, दालों, सब्जियों आदि के अलावा मांसाहारी व्यक्तियों को मीट, मछली, अंडे आदि में भी मिलता है। आयरन एवं प्रोटीन का सम्मिलित रूप ही हीमोग्लोबिन का बेहतर विकल्प है। डॉ. मेहता ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि हीमोग्लोबिन की कमी से प्रभावित व्यक्ति को यदि प्रोटीन एवं आयरन की उसकी आवश्यकता अनुसार मात्रा मिल जाए तो उसे लाभ होता है। उन्होंने कहा कि मैं नहीं मानता कि इस तरह के टॉनिक पर्याप्त असरकारक हैं, अर्थात् अमाशय में पहुंचने के बाद व्यक्ति की जरूरत के मुताबिक ही प्रोटीन एवं आयरन में विभक्त होकर उतनी पूर्ति करेंगे, इसमें संदेह है। इससे बेहतर है कि प्रकृति ने वरदानस्वरूप फल-सब्जियां, अनाज, दालें आदि इनकी उपलब्धि के बेहतर स्रोत रूप में उपलब्ध करा रखे हैं तो मनुष्य को आयरन-प्रोटीनयुक्त ऐसे आहार नियमित लेना चाहिए। मांसाहार से भी इनकी उपलब्धि होती है, लेकिन मांसाहार में दुष्प्रभाव की शंका भी रहती है। बाजार में मिलने वाला मीट पूर्णत: स्वस्थ्य जानवर का ही होगा…इसमें संदेह रहता है। उसे कोई घातक बीमारी भी हो सकती है। उसके खून में विषैले जीवाणु भी हो सकते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि दूषित मांस के दुष्प्रभावस्वरूप अन्य बीमारियां भी आपको घेर सकती हैं। शाकाहारी भोजन भी जो दूषित हो, भले ऐसे भोजन से प्रोटीन-आयरन मिल जाए, लेकिन उसके भी विपरीत प्रभाव हो सकते हैं।

हीमोग्लोबिन की कमी के दुष्प्रभाव

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मानव शरीर में खून की लालिमा हीमोग्लोबिन की मात्रा पर ही निर्भर करती है। रक्त में मौजूद आरबीसी (रेड ब्लड सेल्स) की मात्रा प्रभावित होने पर ही लालिमा प्रभावित होती है और व्यक्ति इसकी कमी से एनीमिया का शिकार हो जाता है। जैसा कि बताया ही गया है कि प्रोटीन एवं आयरन इस कमी को दूर करके मनुष्य को स्वस्थ्य रखते हैं। प्रोटीन की कमी से व्यक्ति काफी कमजोरी, थकान महसूस करता है। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। कार्बोहाइड्रेट्स की तरह प्रोटीन भी शरीर को शक्ति देता है। दालों में यह 20 से 25 फीसदी तक होता है, खून की कमी से लीवर भोजन नहीं पचा पाता। इससे गैस बनती है। आंखों की नीचे की पलक में सफेदी, त्वचा पीली, थकावट, मूच्र्छा आना, पेट की खराबी के साथ दुर्बलता बढ़ती है। ऐसे में प्रोटीन के साथ आयरन की पर्याप्त उपलब्धि बहुत जरूरी है। चौलाई में प्रतिग्राम में 1 मिलीग्राम, सूखी दालों में 7.4 मिलीग्राम, मटर दाने में 5 मिलीग्राम, उबला बथुआ में प्रतिग्राम में 5 मिलीग्राम आयरन मिलता है। व्यक्ति को प्रतिदिन 15 से 20 मिलीग्राम आयरन की पूर्ति करना चाहिए।

ब्लड कैंसर वाले पशु का भी रक्त!

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हीमोग्लोबिन टॉनिक बनाने वाली अधिकांश कंपनियां महाराष्ट्र एवं गुजरात की हैं। मध्यप्रदेश में भी कुछ कंपनियां हैं। अहम् सवाल यह है कि छोटी-मोटी सैकड़ों कंपनियां जो छोटी-सी जगह में बिना रिसर्च व अनुसंधान पर पैसा खर्च किए बिना ऐसे टॉनिक बना रही हैं, जिन्हें इस बात की भी चिंता नहीं है कि जिन जानवरों के खून से हीमोग्लोबिन टॉनिक बनाया जा रहा है, उन्हें ब्लड कैंसर भी हो सकता है अथवा अन्य घातक बीमारियों के कीटाणु, बैक्टीरिया उनके रक्त में शामिल हो सकते हैं। कोई शोध नहीं… बस, धड़ल्ले से टॉनिक बनाओ और मुनाफा कमाओ जैसे यही उनकी नियति है! मानव स्वास्थ्य से जुड़ा यह गंभीर मसला है, जबकि सरकारी स्तर भी इससे बेखबर लगता है। ऐसी कई कंपनियां जो स्वास्थ्यवद्र्धक टॉनिक बनाती हैं, वे ड्रग के लाइसेंस की बजाय फूड के लाइसेंस पर ही कार्य कर रही हैं… तो इस संदर्भ में भी सघन जांच जरूरी हो जाती है। गौरतलब है कि फूड लाइसेंस में बेबी फूड, मिल्क टॉनिक आदि आते हैं, जबकि ग्लोबिन टॉनिक ड्रग लाइसेंस में होने चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार की गर्त में डूबे संबंधित विभागों के नौकरशाहों द्वारा अपने फायदे के लिए जब ऐसी दवाई दुकानों के संदर्भ में आंखें मूंद ली जाती हैं, जिनके मालिक के पास दवाइयां बेचने की शैक्षणिक योग्यता नहीं है अर्थात् वो लाइसेंस का पात्र नहीं हैं, पर किराए पर योग्य व्यक्ति से लाइसेंस लेकर बकायदा दुकान चला रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि देशभर में ऐसे टॉनिक बनाने वालों की संघन जांच की जाए।

शाकाहार भावना के खिलावड़!

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हीमोग्लोबिन टॉनिक बनाने का मुख्य तत्व तो खून ही है। इसी तरह अन्य कई दवाइयां भी ऐसी हैं, जिनके निर्माण में पशुओं के शरीर से ही कुछ ऐसे तत्व ले लिए जाते हैं, जिनकी पूर्ति मनुष्य के लिए जरूरी है। वैसे तो सरकार ने शाकाहारी समुदाय की भावना को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रोडक्ट पर हरा (ग्रीन) चिह्न एवं मांसाहारी तत्व वाले प्रोडक्ट पर लाल (रेड) चिह्न अंकित करने के निर्देश भी दे रखे हैं, लेकिन कई कंपनियां आज भी भारी मुनाफे के लिए उनका पालन नहीं करती हैं। हिमोग्लोबिन के नाम पर लूट के इस धंधे में उल्लेखनीय है कि मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए कई फार्मा कंपनियां भी इसमें शामिल हैं, जो भले ही दवाइयों के निर्माण हेतु लाइसेंस लेने के बावजूद जेनरिक दवाइयों की तुलना में उसी फार्मूले की दवाइयों को अपने ब्रांड नाम से कई गुना ऊंचे दामों पर बेचकर लूटपाट कर रही हैं। विटामिनयुक्त टॉनिकों में काफी कम लागत के बावजूद बेहतर स्वास्थ्य के प्रति मानव की स्वाभाविक चिंताजनक मनोवृत्ति का फायदा ऐसी कंपनियां मनमाने दाम वसूलकर उठा रही हैं। कफ सायरपों में अफीम (कोडीन) की मात्रा, नशे के शौकीनों के लिए सोने में सुहागा साबित होती है तो मुनाफाखोरी करने वाली ऐसी कंपनियां भी कहां पीछे रहती हैं, मनमाने दाम जो उन्हें मिल जाते हैं… ऐसे में मानव स्वास्थ्य से खिलावाड़ हो तो उनकी बला से।

पशु एवं मनुष्य में हीमोग्लोबिन प्रतिशत

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पशुओं एवं मनुष्यों में हीमोग्लोबिन का प्रतिशत आमतौर पर निश्चित रहता है। डॉ. मेहता ने इस संदर्भ में बताया कि पुरुष में सामान्यत: प्रति 100 मिलीलीटर में 15-16 ग्राम, ी में 14-15 ग्राम के लगभग रहता है। पशुओं में मुख्य रूप से गाय, बैल, भैंस आदि शामिल है, उनमें 8 से 15 ग्राम, भेड़ में 8 से 16 ग्राम अथवा औसत 12 ग्राम, सूअर में 13 ग्राम, कुत्ते में 15 ग्राम, बिल्ली में 12 ग्राम, घोड़े में 11.5 ग्राम तथा हाथी में औसतन 13.4 ग्राम हीमोग्लोबिन प्रति सौ मिलीमीटर में होता है।

हीमोग्लोबिन लूट का धंधा

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हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करने के साधन तो प्रकृति ने ही उपलब्ध करा रखे हैं, ऐसे में रेडीमेड हीमोग्लोबिन के नाम पर इनकी छोटी-मोटी सैकड़ों कंपनियां एक तरह से लूट के धंधे में शामिल लगती हैं, क्योंकि स्लाटर हाउसों में मांस (मीट) के लिए जानवर काटे जाते हैं, वहां से उनका खून काफी सस्ते भावों पर ये कंपनियां खरीद लेती हैं। वर्ष 90 के दशक में तो यह खून 30-40 पैसे लीटर ही मिल जाता था, उस दौर में महाराष्ट्र, गुजरात की कई कंपनियों द्वारा इन भावों पर खरीदी की स्थितियां उजागर हुई थीं। यदि उक्त भावों से 10-20 गुना भी दाम बढ़े तो भी वर्तमान में अंदाजा लगाया जा सकता है कि खून तो अभी भी ऐसे टॉनिकों को बनाने में आई लागत की तुलना में काफी सस्ता है। उस दौर में ही जब मात्र 4-5 रुपए की लागत वाले ग्लोबिन टॉनिक की 200 से 280 मिलीलीटर मात्रा के दाम करीब 25 रुपए लिए जा रहे थे, जो आज 60 से 100 रुपए की रेंज में हैं।

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