@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
₹29 लाख करोड़ वसूलने के लिए सरकारी बैंक बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों से कर रहे संघर्ष। सुप्रीम कोर्ट और सरकार खामोश?
बड़े बकायेदारों के कारण सरकारी बैंकों का 29 लाख करोड़ रुपए डूबने की कगार पर!

मार्च 2026 मे भारत के बैंकिंग क्षेत्र से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। जहाँ एक ओर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का दावा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSU Banks) का ‘ग्रॉस एनपीए’ (Gross NPA) गिरकर एक दशक के निचले स्तर (2.15%) पर आ गया है, वहीं दूसरी ओर देश के 11 सरकारी बैंक बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टरों से लगभग ₹28.93 लाख करोड़ वसूलने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। देश के विभिन्न न्यायालयों में हजारों मुकदमे लगा कर लोन की रिकवरी के लिए संघर्ष कर रहे है।
फरवरी 2026 में सरकार ने संसद को सूचित किया था कि बैंकों की सेहत सुधर रही है और NPA न्यूनतम स्तर पर है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी रूप से NPA कम दिखना और वास्तव में भारी भरकम राशि का डिफॉल्ट होना, दो अलग बातें हैं। बैंकों द्वारा लोन को ‘राइट-ऑफ’ (Write-off) कर देने से वे बैलेंस शीट में NPA नहीं दिखते, लेकिन वसूली का संघर्ष जारी रहता है।
ये देश के वो बड़े कॉर्पोरेट घराने है, जिन्होंने कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण और बैंकरों को रिश्वतखोरी के माध्यम से बिना कोलैटरल के अरबों – खरबों रुपए के लोन लेकर हाथ ऊँचे कर दिए है।
सवाल यह है कि क्या बिना कोलैटरल के लोन देने वाले अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई होगी? या फिर अंततः इस भारी भरकम घाटे का बोझ महंगाई, बेरोजगारी झेल रही देश की आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा?
देश के एक आम आदमी को चेक बाउन्स पर जेल की सजा पर देश की सरकारी बैंको से 29 लाख करोड़ रुपए लोन लेकर हड़प जाने वाले देश के चुनिंदा कॉर्पोरेट घराने और बड़े व्यवसायियों पर देश की सुप्रीम कोर्ट और सरकार से लेकर पूरा सिस्टम खामोश?
बिना ‘कोलैटरल’ बांटे गए कर्ज ?
बैंकिंग सूत्रों और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह संकट इसलिए और अधिक गहरा गया है क्योंकि इन बड़े कॉरपोरेट उधारकर्ताओं को दिए गए ऋणों का एक बड़ा हिस्सा ‘बिना किसी संपार्श्विक सुरक्षा’ (Without Collateral Security) के दिया गया था। आरोप हैं कि राजनीतिक रसूख और बैंकिंग अधिकारियों की मिलीभगत से नियम ताक पर रखकर ये लोन बांटे गए। अब स्थिति यह है कि इन डिफॉल्टरों के पास ऐसी कोई भौतिक संपत्ति नहीं है जिसे बेचकर बैंक अपना पैसा वसूल सकें।
- यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ₹9.96 लाख करोड़
- भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ₹5.79 लाख करोड़
- पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ₹2.59 लाख करोड़
- केनरा बैंक ₹2.49 लाख करोड़
- बैंक ऑफ बड़ौदा ₹2.21 लाख करोड़
- बैंक ऑफ महाराष्ट्र 1.78 लाख करोड़
- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया 1.44 लाख करोड़
- यूको बैंक 1.11 लाख करोड़
- इंडियन ओवरसीज बैंक 30,861 करोड़
- पंजाब एंड सिंध बैंक 27,954 करोड़
