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नोएडा के अरबपति चीफ इंजीनियर का कारनामा
खजाने से कम नहीं है यादव सिंह की संपत्ति

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नोएडा। यादव सिंह, यानी यूपी के नार्थ ओखला इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) का अरबपति चीफ इंजीनियर, जिसकी राजनीतिक पहुंच सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से लेकर यूपी की सत्ता से बेदखल हो चुकी बहुजन समाज पार्टी के प्रमुख नेताओं तक। ऐसी तगड़ी राजनीतिक हैसियत वाले यादव सिंह के नोएडा स्थिति घर पर आयकर अधिकारियों ने टीम ने 27 नवंबर को छापा मारा, तो उनके घर से करोड़ों रुपए के हीरे और जेवरात के साथ चालीस ऐसी दिखावटी कंपनियों के दस्तावेज हाथ लगे, जिनके नाम पर विकास प्राधिकरण से प्लाट हथियाए गए। इन्हें बेच कर करोड़ों रुपए बनाए गए। छापे में यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता के नाम पर बनाई गई कंपनी का भी पता आयकर अफसरों को चला। यादव सिंह के एक नजदीकी राजेन्द्र मनोचा के घर के बाहर खड़ी कार से 10 करोड़ रुपए आयकर विभाग की टीम ने बरामद किया है।
यादव सिंह की ऑडी गाड़ी घर के बाहर मिली। उनके ‘पार्कÓ से लाखों रुपए के कुत्ते और पक्षी भी अफसरों को मिले। एक दर्जन से अधिक लॉकर उनके और उनके परिवार के लोगों के होने का पता चला। आयकर अफसरों का अनुमान है कि यादव सिंह एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का मालिक है। आयकर महानिदेशक (जांच) कृष्णा सैनी के अनुसार, यादव सिंह को लेकर शिकायतें प्राप्त हुई थीं कि बोगस कंपनियों के नाम पर नोएडा में जमीनों का आवंटन कराया जा रहा है। बाद में कंपनियों को बेच कर भारी मुनाफा कमाया जा रहा है। इसमें बड़े पैमाने पर आयकर की चोरी की जा रही है। इस शिकायत के आधार पर बीते गुरु वार को नोएडा स्थित मैक्कन इंफ्रा प्रालि और मीनू क्रिएशंस प्रालि के नोएडा, दिल्ली व गाजियाबाद स्थित 25 ठिकानों पर मारे गए। इनमें मैक्कन इंफ्रा के निदेशक राजेंद्र मनोचा, नम्रता मनोचा, अनिल पेशावरी व मीनू क्रिएशंस की निदेशक कुसुमलता के दफ्तर व आवास शामिल हैं। कुसुमलता ही यादव सिंह की पत्नी हैं, जो पूर्व में मैक्कन इंफ्रा की निदेशक रह चुकी हैं।
नोएडा विकास प्राधिकरण के अरबपति चीफ इंजीनियर, यादव सिंह के यहां छापे में मिले दस्तावेजों और नकदी की बरामदगी से आयकर अधिकारी भी सन्न रह गए। इसकी वजह बड़ी संख्या मिले में प्रॉपर्टी संबंधी दस्तावेज थे। इन दस्तावेजों से पता लगा कि बीते तीन-चार वर्षों में कोलकाता से बोगस कंपनियों के शेयर होल्डिंग बनाए गए। फिर ऐसी करीब 40 कंपनियों को नोएडा में भूखंड आवंटित कराए। बाद में इन कंपनियों को दूसरी कंपनियों को बेच दिया गया। छापे के दौरान ही मीनू क्रिएशंस के ठिकानों पर बड़ी मात्र में स्टॉक भी मिला है। कंपनी फैशन व डिजायनर वस्त्रों का कारोबार करती है। साथ ही बेनामी संपत्तियों से संबंधित दस्तावेज भी बड़ी संख्या में मिले हैं। यादव सिंह की एक डायरी भी आयकर अफसरों को मिली, जिसमें उसने किस-किस नेता को प्लाट और कमीशन दिया है, इसका ब्योरा दर्ज है। छापेमारी के बाद यादव सिंह देश भर में चर्चा का केंद्र बन गए, कैसे नोएडा प्राधिकरण का एक जूनियर इंजीनियर देखते-देखते न सिर्फ उसका चीफ इंजीनियर बन गया, बल्कि बीते माह अखिलेश सरकार ने उसे ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का भी चीफ इंजीनियर बना दिया, जबकि अखिलेश सरकार ने ही सत्ता में आने के बाद यादव सिंह को बसपा सरकार का हमदर्द अधिकारी मानते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई की थी। अचानक ऐसा क्या हुआ कि अखिलेश सरकार का रुख यादव सिंह को लेकर बदल गया और उन्हें दो प्राधिकरणों का चीफ इंजीनियर बना दिया गया। इसकी पड़ताल की, तो यादव के ऊंचे राजनीतिक संबंधों की परतें धीरे-धीरे खुल गयीं। पता चला कि राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं को और उनके नजदीकी लोगों को नोएडा में प्लाट मुहैया करा उसने अपना सिक्का नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण में जमा कर अरबों रुपए जुटाए हैं। वर्षों से वह यही कर रहा है।
यादव की डायरी में कई राज
संपत्ति से ज्यादा चौंकाने वाले कई राज यादव की डायरी में हैं। यह डायरी आयकर अधिकारियों को छापेमारी के दौरान मिली है। इसमें कई नेताओं, बड़े अफसरों और रसूखदारों के नाम हैं। डायरी में नोएडा के प्लॉटों को लेकर हुए लेन-देन का ब्योरा है। यह भी दर्ज है कि किस अधिकारी और किस नेता को कौन से प्लॉट के आवंटन में कितना कमीशन दिया गया। इसके अलावा किन अधिकारियों या नेताओं के कहने पर प्लॉटों का आवंटन किया गया। इन तथ्यों के आधार पर आयकर विभाग कुछ रसूखदारों से पूछताछ कर सकता है। डायरी में में पिछली सरकारों के भी कई कद्दावर नेताओं और अच्छी पोस्टिंग पर रहे कई नौकरशाहों, उद्योगपतियों और अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। आयकर विभाग की टीम उन उद्योगपतियों पर भी शिकंजा कस सकती है, जिन्होंने रिश्वत देकर या गलत तरीके से प्लॉटों का आवंटन कर मुनाफा कमाया। इस प्रकार की जांच में कई बड़े नामों के खुलासे भी हो सकते हैं, और बड़ा गड़बड़झाला सामने आ सकता है। इसको लेकर बड़ी सतर्कता बरती जा रही है, कि यादव से जुड़े राजनीतिज्ञों के नाम बेहद गोपनीय रखे जाएं, ताकि राजनीतिक गलियारे में हड़कंप न मचे, क्योंकि यादव सिंह बसपा सरकार के ही चहेते नहीं रहे, उनकी अच्छी खासी पैठ सपा सरकार में भी रही है और कांग्रेस व भाजपा में भी उनके अच्छे खासे तार जुड़े हैं।
सिंगापुर-थाईलैंड से जुड़े हैं तार…

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जैसे-जैसे यादव सिंह की जांच आगे बढ़ रही है, उनकी कारगुजारी की परत-दर-परत प्राधिकरण में खुलने लगी और विदेशी कनेक्शन भी सामने आने लगा है, जहां पर पूंजी निवेश की अटकलें लगाई जा रही हैं। बसपा सरकार में 2007-09 के बीच यादव सिंह ने एक दर्जन बार विदेशों का दौरा किया। इसमें दो बार आधिकारिक रूप से विदेश जाने की बात प्राधिकरण के ओर से बताई जा रही है, लेकिन सिंगापुर व थाईलैंड जैसे देशों का गैरआधिकारिक दौरा यादव सिंह की ओर से बार-बार क्यों किया गया? यह बात फिलहाल समझ से परे है। बताया तो यह भी जा रहा है कि धनकुबेरों के लिए ये देश काफी मुफीद माने जाते हैं, क्योंकि यहां पर पंजाबी भारतीयों का बड़ा वर्चस्व है। थाईलैंड तो पूरी दुनिया में अय्याशी के लिए मशहूर है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यादव सिंह ने अपनी पत्नी को किसी रणनीति के तहत तलाक तो नहीं दिया, जिससे थाईलैंड में काली कमाई को खपाया जा सके। गौरतलब है कि यहां पर नागरिकता प्राप्त किसी भी लड़की से शादी करने के बाद जमीन खरीद कर आसानी से कारोबार शुरू किया जा सकता है। हालांकि, अभी पूरी तरह चीजों को स्पष्ट होना बाकी है, लेकिन कयास लगने से शुरू हो ही चुके हैं।
1980 में जेई के पद से की थी शुरुआत
नोएडा में जूनियर इंजीनियर के पद पर सन 1980 में यादव सिंह ने नौकरी शुरू की। 1985 में उन्हें प्रमोट करके प्रोजेक्ट इंजीनियर बनाया गया। 1995 में यादव सिंह को एक और प्रमोशन दिया गया, वह भी इस शर्त पर कि वह अगले तीन साल में डिग्री हासिल कर लेंगे। यादव सिंह ने तय समय में ही यह शर्त पूरी कर ली। इसी दरम्यान वह बसपा नेताओं के संपर्क में आए। इसी के बाद नोएडा और ग्रेटर नोएडा में उसका सिक्का चलने लगा। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अध्यक्ष एवं सीइओ भी उसे साथ लेकर चलने लगे। प्लाटों के आवंटन में यादव सिंह की कोई भूमिका न होने के बाद भी प्राधिकरण के बड़े अधिकारी उसकी राय लेने लगे। जिसके चलते मायावती की पिछली सरकार में यादव सिंह ने नियमों को ताक पर रख कर 954 करोड़ रुपए के ठेके अपने करीबियों को बांट दिए थे। भाजपा नेता किरीट सौमैया ने यादव सिंह की कई फर्जी कंपनियों का पर्दाफाश किया था और आरोप लगाए थे कि यादव सिंह के मायावती के भाई के साथ व्यावसायिक संबंध हैं। अखिलेश सरकार ने 954 करोड़ रुपए के ठेके बांटने के मामले को लेकर यादव सिंह के खिलाफ विभागीय जांच बिठाकर उसे निलंबित कर दिया, लेकिन ये सरकार भी ज्यादा दिनों तक यादव सिंह को नोएडा से दूर नहीं रख पाई। नवंबर, 2013 में एक बार फिर उसे बहाल कर दिया गया, वह भी तत्कालीन प्रमुख सचिव (औद्योगिक विकास) एसपी सिंह की राय लिए बिना। इस पर जब प्रमुख सचिव ने नोएडा के सीइओ रामरमन से पूछताछ की तो उन्होंने प्रमुख सचिव को कोई जवाब नहीं दिया। उलटे, चंद दिनों बाद ही एसपी सिंह को उनके पद से हटा दिया गया।

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