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स्वास्थ्य व शारीरिक विकास की जरूरतों पर आधारित खान-पान व जीवन शैली के अलावा सेक्स के प्रति बदलता नजरिया ही भारत में एक शारीरिक व मानसिक रूप से विकसित पीढ़ी का निर्माण कर देश को उन्नति व विकास के रास्ते पर लाकर खड़ा कर सकता है। जरूरत है हमारी युवा पीढ़ी को सही खान-पान, जीवन शैली व सेक्स के जरिये मानसिक रूप से परम आनंद प्राप्त करने की शिक्षा के साथ खुला माहौल देने की, न कि सेक्स को रात के अंधेरे में चोरी छिपे बंद दरवाजे का काम बताकर सामाजिक व धार्मिक अवधारणा से युक्त करके अपराध बोध से ग्रस्त करने की।
रीर की दो आधारभूत आवश्यकताएं हैं, एक भोजन व दूसरा सेक्स। किसी भी मनुष्य या जानवर को मानसिक व शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ बनाने के लिए इन दो बातों की सबसे ज्यादा अहमियत है। यदि ये दोनों चीजें आपको स्वस्थ तरीके से व सही वक्त पर लेना नहीं आती हैं, तो आप कभी भी मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं रह सकते हैं।
इस मामले में इंसानों व जानवरों के बीच ज्यादा फर्क नहीं है, क्योंकि यह प्राकृतिक क्रिया है। हम तो जानवरों से भी गए बीते हैं। आज भारत में तकरीबन 90 प्रतिशत भारतीय शरीर के कमर के नीचे व कमर के ऊपर के दोनों हिस्सों, मतलब सेक्स व मानसिक सेक्स व पेट पूजा (भोजन) के प्रति शिक्षित नहीं हैं। इस वजह से भारत की अधिकांश आबादी शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार है तथा शारीरिक व मानसिक रोगियों की दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या का खिताब सदियों से हमारे पास सुरक्षित है और हर साल इसमें बड़ी तेजी से इजाफा हो रहा है। एक वक्त आएगा, जब सारी दुनिया में सबसे बड़ी शारीरिक व मानसिक बीमारियों की शिकार जनसंख्या हमारी होगी, जहां जानवर भी हम पर हंसेंगे, क्योंकि वो भी हम से ज्यादा शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।
वहीं, दूसरी ओर सेक्स के प्रति हमारा नजरिया बंद दरवाजों में गंदा काम व रात के अंधेरे में चोरी-छिपे बच्चे पैदा करने के गंदे खेल की विचारधारा तक ही सीमित है। अधिकांश भारतीयों का अपने पार्टनर के साथ सेक्स करने का तरीका पाशविक है। जानवरों की तरह मुख्यत: एक या दो मुद्राओं में सेक्स कर स्खलित करने मात्र को ही सेक्स कहते हैं। वहीं, दूसरी ओर गांवों, कस्बों व तहसीलों में जहां भारत की अधिकांश आबादी निवास करती है, वहां सामाजिक रूप से स्त्री-पुरुषों को यह शिक्षा दी जाती है कि संतान उत्पत्ति व वंश को आगे बढ़ाने के लिए विवाह संस्कार व परिणय सूत्र के बाद सेक्स किया जाए। शादी के बाद ही सेक्स को सामाजिक रूप से मान्यता दी जाती है।

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भारत में अधिकांश लोगों को आज तक यह समझ नहीं आया कि पेट व शरीर की सेक्सुअल भूख एक प्राकृतिक आवश्यकता है, ना कि सामाजिक। यह भूख हर इंसान, जानवर, पशु-पक्षियों में कुदरती है। ईश्वर या लोग जो ईश्वर को नहीं मानते हैं, दोनों का मत इसमें एक समान है कि जीवन के विकास के लिए यह ऊर्जा भोजन के रूप में प्राप्त होकर, सेक्सुअल ऊर्जा के रूप में रूपांतरित होती है। चूंकि पेट की आग व सेक्स की भूख नैसर्गिक है और इन दोनों आवश्यकताओं को सही तरह से प्राप्त करने की शिक्षा देने का दायित्व हमारे समाज व नीति निर्धारकों का है, जिसको कभी भी इन्होंने गंभीरता से नहीं लिया है, न ले रहे हैं? जबकि इन्हीं दोनों की बुनियाद पर मनुष्य व समाज की एक सही इमारत खड़ी होती है और देश व समाज का विकास तय होता है।
लेकिन किसी ने भी, न तो समाज ने, ना ही सरकार ने और यहां तक कि हमारे धर्माचार्यों ने कभी भी इस बारे में लोगों को शिक्षित करने व उन्हें यह बताने की कोशिश नहीं कि सेक्स का मजा लेना व बच्चे पैदा करना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी ने नहीं बताया कि विवाह के बाद संभोग करना व सेक्स का आनंद लेना तथा एक-दूसरे की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर अपने साथी को इतना संतुष्ट कर देना कि वह मानसिक रूप से स्वर्गानंद का अनुभव करे या बगैर किसी जोखिम के सेक्स का सम्पूर्ण आनंद गर्भवती न होने की शर्त पर हो, ऐसे सेक्स की शिक्षा हमें किसी ने भी आज तक देने की पहल नहीं की। सरकार ने जनसंख्या को रोकने के उपाय जैसे निरोध, माला डी व कॉपर टी जैसे गर्भ निरोधक उपायों को बेचने व उनका प्रचार-प्रसार करने में सरकारी शिक्षकों व सरकारी मशीनरियों के जरिये अरबों-खरबों रुपए उसी तरह बहा दिए, ठीक वैसे ही जैसे भारतीयों ने अपनी लिंग उत्तेजना को शांत करने के लिए वीर्य बहाया हो।
लेकिन अब भारतीय पुरुषों व महिलाओं को बिना किसी गर्भ की आशंका के पूर्ण रूप से शारीरिक व मानसिक चरम आनंद की अनुभूति से युक्त काम क्रीड़ा बिना लाइट बंद किए करते हुए चरम आनंद प्राप्त करने की कला की बात खुले व बेबाक अंदाज में करना पड़ेगी। नहीं तो हम सेक्स के नाम पर गंदा खेल खेलते रहेंगे तथा जिस तरह अशिक्षित व बिना किसी मानसिक आनंद की अनुभूति किए हम एक-दूसरे के साथ संभोगरत रहते हैं, मात्र अपनी उत्तेजना शांत करने के लिए वो भी बीमार व अस्वस्थ शरीरों के साथ, तो उसके परिणामस्वरूप भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ी भी शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चे के रूप में होगी।
जिस तरह शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान न रखते हुए मात्र अपने स्वाद के लिए बाजार में फैले बीमारियों व अस्वास्थ्यकर चाट, नाश्ते के ठेले जो अमूमन कचरे व गंदगी के ढेर पर गरमागरम के नाम से हानिकारक तेलों व अन्य सामग्रियों से बनाए जाते हैं, जिनका मात्र पेट की भूख व स्वाद के वशीभूत होकर आंखें बंद कर स्वाद लेते हैं, बिना यह समझे कि ये शरीर के स्वास्थ्य के लिए कितने हानिकारक हैं, उसी तरह पेट के नीचे की आग को शांत करने के लिए शहरों, हाईवे तथा अब कस्बों तक फैले देह व्यापार के अड्डे जो तंग बस्तियों तथा गंदगी से भरे असामाजिक माहौल में होते हैं, तथा यहां शारीरिक बीमारियों से युक्त लड़कियां पुरुषों के शारीरिक स्वाद की वासना को शांत करने के लिए अनैतिक व बीमारियों से युक्त नाश्ते की प्लेट या थाली की तरह अपने शरीर को परोस रही हैं।

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जिस तरह से खान-पान व भोजन के प्रति अशिक्षा कई बीमारियों को जन्म देने का कारण है, उसी तरह गरीबी और अज्ञानता की वजह से पर्याप्त पौष्टिक भोजन उपलब्ध न होने के कारण अधिकांश भारतीय बीमार रहते हैं। बीमार, गरीब व अशिक्षितों के साथ ही पढ़ा-लिखा निम्न व मध्यमवर्ग, जिसे सही तरह से तथा शरीर के विकास के लिए जरूरी खाद्य पदार्थों, सब्जियों तथा फल-फूलों के बारे में ज्ञान नहीं है और जो स्वाद को सर्वोपरि रखकर पेट भरने की प्रवृत्ति अपनाता है, वह बीमारियों का जन्म होने की वजह से शारीरिक रूप से अस्वस्थ होता है। जब ये ही लोग सेक्स का आनंद लेने में गर्भ के जोखिम के साथ व एकतरफा मानसिक संतुष्टि के लिए संभोगरत होते हैं, तो एक नई अस्वस्थ, शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार पीढ़ी जन्म लेती है, जो भारत के विकास व भविष्य के लिए घातक है। उसी तरह सेक्स के साथ हमने रवैया अपनाया। शारीरिक उत्तेजना व गर्मी, जो हमारी कमर के निचले हिस्से में नैसिर्गिक रूप से प्रवाहित होती है, को शांत करने के लिए हमने अपने यहां की लाखों-करोड़ों महिलाओं को गर्भवती कर 100 करोड़ से अधिक की जनसंख्या खड़ी कर दी है। इस जनसंख्या को खड़ी करने के लिए विवाह व परिणय रूपी संस्कारों व व्यवस्था ने सामाजिक व कानूनी रूप से अमलीजामा पहनाने में महती भूमिका अदा की। कम उम्र में बिना सेक्स ज्ञान के लड़के-लड़कियों की शादी कर साथ रहने की व्यवस्था कर दी, वे शरीर की उत्तेजना को शांत करने के लिए संभोगरत हुए व 5 से लेकर 10 बच्चों तक की फौज खड़ी करने में अपना योगदान देने लगे। इस तरह बंद दरवाजों में अशिक्षित यौन क्रियाओं द्वारा संभोग का आनंद लेने ने भारत को दुनिया के सबसे बड़ी बीमार जनसंख्या वाले, विश्व के नंबर 1 देश की श्रेणी में ला रखा है। चूंकि यह अशिक्षित कार्य रात के अंधेरे में (भारत में वैवाहिक सेक्स अधिकतर लाइट बंद कर बंद दरवाजों में व चोरी-छिपे किए जाते हैं) किया जाता है और महिलाएं इसे गंदा काम समझती हैं और इसी नासमझी की वजह से पुरुषों ने स्त्रियों को मात्र अपनी उत्तेजना शांत करने और बच्चे पैदा करने की मशीन समझा और वीर्य का उपयोग किसी कच्चे माल की तरह किया।

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