@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
धिक्कार है उस कौम, अदालत और संसद को जो व्यक्तिगत धर्म को राष्ट्र धर्म से ज्यादा महान मानती हैं!!
धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर, जहाँ राष्ट्रधर्म के ऊपर व्यक्तिगत धर्म खड़ा है!

आजादी के 78 वर्षों के बाद भी यह चिंतन और शर्म का विषय है कि हमारे देश में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कोई स्पष्ट वैधानिक बाध्यता तय नहीं की गई है, विशेषकर उन जनप्रतिनिधियों के लिए जो संवैधानिक और वैधानिक पदों पर आसीन हैं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट के पास व्यापक अधिकार हैं और केंद्र व राज्य सरकारें कानून बनाने में सक्षम हैं, किंतु अब तक इस दिशा में कोई ठोस कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया गया है।
देश के हर धर्म से बड़ा राष्ट्र धर्म है। किसी भी धर्म, संप्रदाय और जाति को राष्ट्र के सम्मान से पहले अपने व्यक्तिगत धर्म को सर्वोपरि मानने का अधिकार नहीं है।
मुस्लिमों को किस मूर्ख आदमी ने यह बता दिया कि वंदे मातरम् कहना कुरान और इस्लाम के खिलाफ है?? अल्लाह के अलावा किसी सम्राट, शहंशाह, सेठ, व्यक्ति विशेष या हुक्मरान को पूजना या उसकी शान में वंदना करने के लिए बेशक इस्लाम या कुरान में गुस्ताखी हो सकती हैं पर मादरे वतन के लिए पवित्र इस्लाम धर्म और कुरान शरीफ में तो कदापि नहीं। सिर्फ राजनीति और विद्वेष के लिए धर्म को बीच में लाना न सिर्फ कौम का वरन् धर्म का भी अपमान है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि समाज के मार्गदर्शक होते हैं। यदि वे स्वयं कानूनन इन प्रतीकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करेंगे, तो इससे पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक नई ऊर्जा का संचार होगा। समय आ गया है कि राष्ट्र के सम्मान को मात्र ‘नैतिक विकल्प’ या धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार न मानकर एक ‘संवैधानिक अनिवार्यता’ के रूप में स्थापित किया जाए।”
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
