@री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
इंसान की असमय मृत्यु ईश्वर के हाथ में है! ऐसा मानना आज के युग में कहाँ तक उचित है?
असमय मृत्यु और दुर्भाग्य क्या आज भी ‘ईश्वर’ के हाथ में है? या आज हम अपनी मृत्यु स्वयं चुनते है?

प्रत्येक मौत ईश्वर का बुलावा था! या होनी को कौन टाल सकता है! यह तो ईश्वर की मर्जी है! भाग्य में यही लिखा था! जैसी बातों से क्या हम अपनी विज्ञान, तकनीक, टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल और जीवन शैली के प्रति अपनी अज्ञानता, अशिक्षा, मूर्खता, लापरवाहियों पर पर्दा डालने का आत्मघाती कृत्य करते जा रहे है??
रोज सड़को पर कितने लोग एक्सीडेंट में मारे जाते है? आग लगने से घर में ही पूरे परिवार का खत्म होना? आत्महत्या? ट्रेन, प्लेन एक्सीडेंट? मजदूरों का खदानों और चैंबरों में दम घुटने से मरना? कंस्ट्रक्शन साइड पर खतरनाक परिस्थितियों में मजदूरों का असमय मौत के मुँह में समा जाने को…….. दूषित पानी, दूषित हवा, दूषित खानपान, शराब, सिगरेट, ड्रग्स, नशा, दूषित लाइफ़ स्टाईल से समय के पहले मर जाना? दंगों…. युद्धों आदि में काल के गाल में समा जाने को क्या आप ईश्वर की इच्छा कह सकते है?
हमारे चारों तरफ हमने असमय मौत का सामान इकठ्ठा कर रखा हैं! घर से लेकर सड़क तक मौत के कुएं में जी रहे है, भाग रहे है, दौड़ रहे हैं। दुर्घटना होने से मृत्यु हो जाने को ईश्वर को यही मंजूर था! और भाग्य में यही लिखा था कहकर इतिश्री कर लेते है।
आज हमने अपने जीवन को सड़क से लेकर घर तक सब जगह सांप सीढ़ी के एक खेल की तरह उपभोग की सीढ़ी का एक ब्रैकेट और दूसरी तरफ मौत के मुंह की खाई के ब्रैकेट के बीच जी रहे है। कब उपभोग का कौन सा पाशा हमे मौत की खाई के ब्रैकेट में ले जाकर खड़ा कर दे।
इस संसार में प्रत्येक सजीव, निर्जीव, चल, अचल, पेड़, पौधे, हवा, पानी, नदी, पहाड़, जंगल, पशु, पक्षी, सभी सॉलिड, लिक्विड, गैस रूपी पदार्थ, और सबसे होशियार समझे जाने वाला बुद्धिजीवी मनुष्य सब विज्ञान की एक रसायनिक प्रक्रिया (केमिकल रिएक्शन) से निर्मित उत्पाद (प्रोडक्ट) है। सबका अपना एक निश्चित वातावरण, एक निश्चित तापमान, एक निश्चित दवाब और एक निश्चित लाइफ़ स्टाइल के तहत लाइफ पीरियड निश्चित है।
पूर्ण रूप से वैज्ञानिक इस जगत में तब तक असमय कुछ घटित नहीं होता है, जब तक इसके वैज्ञानिक और रसायनिक समीकरण के साथ छेड़छाड़ न की जाए।
हंसती, खेलती जिंदगी में असामयिक दुर्घटनाओं से कब, कैसे, किस किस तरह से किन लापरवाहीयो, गलतियों, मूर्खताओं की वजह से एक हंसता खेलता परिवार व्यक्ति असमय मौत के मुँह में समा सकता हैं? इस विषय की शिक्षा स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी से देना आज के समय में नितांत आवश्यक है क्योंकि आज हम सबसे ज्यादा वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। 24 घंटे हम तकनीक, टेक्नोलॉजी से इस्तेमाल उत्पादों को इस्तेमाल कर रहे है।
मनुष्य का शरीर जितने रसायनिक पदार्थों और समीकरणों से निर्मित होता हैं क्या उतने रासायनिक पदार्थों का सेवन प्रत्येक इंसान अपने खानपीन और जीवन शैली में भोजन या वातावरण के माध्यम से लेता है?? यह भी एक वजह है शरीर का समय से पहले खत्म होने का।
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
