महिलाओं पर जैसा उत्पीडऩ, हिंसा व अपराध हो…

उसकी सजा उतनी ही वीभत्स, हिंसक व बर्बर होना चाहिए!

  • वीभत्स, भयानक और दर्दनाक सजा की चेतावनी के विज्ञापन और विजुअल्स का 24 घंटे प्रसारण हो

  • इस देश में नारी के साथ किसी भी तरह के अपराध के लिए सम्पूर्ण समाज को कठोर चेतावनी के साथ दण्डित करना आवश्यक है!

  • किसी भी लड़की, महिला, पत्नी या बच्ची के साथ किए गए अपराध की सजा उतनी ही वीभत्स, हिंसक व बर्बर होना चाहिए जितना अपराधी ने उसके साथ किया है!

री-डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर। भारत में महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों और पत्नियों के साथ शारीरिक, मानसिक, लैंगिक प्रतारणा, घरेलु हिंसा, सामाजिक हिंसा, बलात्कार, छेड़-छाड़, भेदभाव जैसी अमानवीय और शर्मनाक अपराधिक कृत्य समाज के हर तबके, वर्ग व संप्रदाय में सदियों से होती आ रही है! फिर चाहे वह पढ़ा-लिखा वर्ग हो या निरक्षर वर्ग हो, धनवान या कुलीन वर्ग हो, गरीब हो या झुग्गी-झोपडी में रहने वाला तबका हो, किसी भी जाति या धर्म का हो, संस्कारवान हो या संस्कार विहीन कुल का हो सभी ने इस देश की स्त्री जाति के साथ दोयम दर्जे का भेदभाव, तिरस्कृत, हिंसक, प्रतारणा, उपहासपूर्ण, अहंकारी, दबंगई और क्रूरता पूर्ण व्यवहार कही कम या ज्यादा तकरीबन हर समाज में हर उम्र के लोगों द्वारा कालांतर से वर्तमान तक निरंतर किया जाता रहा है!
स्त्री जाति के साथ विभिन्न तरह का जाहिल, बर्बर, हिंसक, वीभत्स और पशुतापूर्ण व्यवहार को समाज के हर तबके के विचारों, रीतियों, कुरीतियों, संस्कारों और पुरुषवादी मानसिकता से जड़ से समूल रूप से ख़त्म करने के लिए सरकार और सुप्रीम कोर्ट को कठोर से कठोरतम त्वरित दंड एक अल्प अवधि में सुनिश्चित समय सीमा में देना कानूनन आवश्यक करना होगा। और अपराध की सजा उतनी ही वीभत्स, हिंसक और बर्बर होनी चाहिए जितनी किसी अपराधी ने किसी स्त्री जाति को दी है! सजा इतनी भयानक और दर्दनाक होनी चाहिए की समाज की रूह काप जाए।
अपराधी के अलावा उसके परिवार, रिश्तेदार, पास-पड़ोस, मोहल्ला उसकी जाति और समाज को भी कुछ न कुछ सजा या आज्ञापक दिशा-निर्देशों की चेतावनी के साथ दण्डित करना आवश्यक है, क्योंकि सदियों से यहां तक महाभारत काल के पहले से यह नपुंसक समाज नारी के साथ दोयम दर्जे का अमानवीय पशुतुल्य व्यवहार करता और देखता आ रहा है! वो समाज जो नारी के साथ अमानवीय, भेदभाव हिंसक और मानसिक, शारीरिक प्रतारणा करता है उसे सभ्य समाज का दर्जा नहीं दिया जा सकता है! इसकी सजा पूरे समाज को देना आवश्यक है! जिससे पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी तय हो की किसी भी लड़की, महिला, पत्नी, प्रेमिका यहां तक किसी वैश्या के साथ भी किसी भी तरह की शारीरिक, मानसिक और लैंगिक अपराध करने की जुर्रत किसी इन्सान तो क्या जानवर में भी न हो!
और सजा के प्रावधानों का विज्ञापन अखबारों, होर्डिंग, टेलीविजन, सोशल मीडिया में युद्धस्तर पर चलाया जाय। खिलाड़ी, फिल्मी हीरो हीरोइन, राजनेताओं, मंत्रियों उद्योगपतियों के अलावा धर्मगुरुओं, पुजारियों, शिक्षाविदों, पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों से कठोरतम और अमानुषिक सजा की चेतावनी के विजुअल्स टीवी, फिल्म, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मेलों और बाजारों में 24 घंटे प्रसारित होना चाहिए।
अपराध और अपराधियों के खिलाफ युद्ध का उदघोष हो तब जाकर इस देश की मानसिकता में सदियों से नारी को दोयम दर्जे की अपराधिक मानसिकता को ख़त्म करने में सफलता मिलेंगी।

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